राममय हनुमान: किष्किंधा से अयोध्या तक के प्रसंगों में छिपा जीवन का सार

राममय हनुमान: किष्किंधा से अयोध्या तक के प्रसंगों में छिपा जीवन का सार
अध्यात्म। राम भक्त हनुमान जी को समर्पित दिवस। शनिवार भी राम भक्त हनुमान जी का दिवस है। हनुमान जी जब जानकी मां की खोज में समुद्र लांघकर लंका पहुंचे तो उन्होंने वहां देखा कि लंकाधिपति रावण की कैद शाला में अनेक देवता थे। हनुमान जी ने उन सभी देवों को रावण के कारागार से मुक्त कराया। शनिदेव कृतकृत्य हो उठे और उन्होंने अपना दिवस हनुमान जी को समर्पित किया और कहा कि जो भी आपका दर्शन शनिवार के करेगा वह मेरी पीड़ा से मुक्त रहेगा। आपने यह भी देखा होगा कि शनिवार के दिन हनुमान जी को तेल भी समर्पित किया जाता है। आइए, आज हनुमान जी के जीवन के कुछ प्रसंगों की चरण रज लेने का प्रयास करते हैं।
1. किष्किंधा पर्वत की तलहटी: प्रभु श्रीराम से प्रथम भेंट
हनुमान जी की प्रभु राम से पहली भेंट किष्किंधा पर्वत की तलहटी पर हुई। प्रभु श्री राम शबरी नामक भीलनी के कहने पर किष्किंधा पर्वत की तलहटी पर पहुंचे, जहां उन्हें शबरी ने कहा था कि आप सुग्रीव से मित्रता करिये और वह आपकी मदद जानकी मां की खोज में करेगा।
यहां पर आने पर प्रभु श्री राम और शेषावतार लक्ष्मण को सुग्रीव ने देखा और स्वभाव से भीरु वह कांप उठा। उसने अपने सचिव हनुमान जी से कहा कि नीचे देखो और पता लगाओ कि ये दोनों कौन हैं। कहीं ये बाली के द्वारा भेजे गए प्राणी तो नहीं हैं।
हनुमान जी ब्राह्मण का वेष बनाकर वहां पहुंचते हैं जहां श्री राम और लक्ष्मण हैं और पूछते हैं—
"को तुम श्यामल गौर शरीरा..."
प्रभु श्री राम अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि वे कौशलेंद्र दशरथ के पुत्र हैं और अपने पिता के वचनों के पालने के लिए वन में आए हैं। उनके साथ एक नारी थी जिसका हरण निशाचर ने कर लिया है और वे उन्हें खोजने के लिए आए हैं।
हनुमान जी ने यह सुनकर प्रभु श्री राम के चरणों पर लोट गये और कहा कि हे प्रभु मैं तो एक जीव हूं और भटकाव या भूल करना मेरा स्वभाव है लेकिन आप तो परमात्मा हैं, इस पृथ्वी के स्वामी और आराध्य हैं। आपने ऐसी ग़लती कैसे की कि आपने मुझे नहीं पहचाना।
प्रभु श्री राम ने कहा कि सत्य में भूल तो तुमने की है। तुम यहां ब्राह्मण के वेश में आए हो और मेरे संस्कार में ब्राह्मण को दण्डवत प्रणाम करना है। यहां जहां मुझे ब्राह्मण को प्रणाम करना चाहिए था और मैंने देखा कि ब्राह्मण ही मुझे प्रणाम कर रहा है तो यह स्पष्ट हो गया कि तुम ब्राह्मण नहीं हो, केवल वेश धारणीय ब्राह्मण हो।
हनुमान जी ने कहा कि चलिए किष्किंधा पर्वत पर और मेरे कंधे पर बैठ कर और मेरे सिर को पकड़ कर।
क्यों? प्रभु श्री राम ने पूछा।
हनुमान जी ने कहा कि मेरी बुद्धि भ्रमित न हो, इसलिए आप इसे सदा पकड़े रहिए। और हुआ भी ऐसा। प्रभु श्री राम ने हनुमान जी की बुद्धि को सदा दिशा निर्देश दिया। हनुमान जी प्रभु श्री राम और लक्ष्मण को किष्किंधा पर्वत पर ले गए और सुग्रीव से मित्रता कराई। ऐसी साधारण मित्रता नहीं, अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता कराई।
2. निराभिमानी हनुमान और लंका यात्रा की प्रेरणा
हनुमान जी का अपना एक गुण है कि उन्हें अपनी शक्तियों का अभिमान नहीं। उन्हें सदा यह याद दिलाना पड़ता है कि उनमें अपार शक्ति है। वे अष्ट सिद्धि नौ निधियों के दाता हैं।
"का चुप साध रह्ये हनुमाना..."
जगत में वह कौन सा कार्य है जो आप नहीं कर सकते।
सीता जी की खोज में जाने से पहले वह अपने नायक जामवंत जी से पूछते हैं कि लंका में उन्हें क्या करना है। वे कहते हैं कि हे जामवंत, कहो तो मैं इस समुद्र को ही पी जाऊं, कहो तो मैं पूरी लंका को ही समुद्र में डुबो दूं, कहो तो मैं रावण को सपरिवार यहां बांध कर ले आऊं। आप मुझे ठीक ठीक बताओ कि मुझे क्या करना है। जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा कि केवल जनक नंदिनी का पता लगाना है।
अब हनुमान जी अपनी यात्रा पर निकलते हैं। उन्हें सबसे पहले एक सोने का पहाड़ मिलता है और उनसे कहता है कि वह उनके पिता का मित्र है और वह चाहता है कि वे इतनी लंबी यात्रा पर जा रहे हैं और वे कुछ देर रुक कर और विश्राम करके जाएं। हनुमान जी श्री राम के भक्त हैं और यह कहकर—
"राम काज कीन्ह्यो बिना मोहि कहां विश्राम।"
हनुमान जी संदेश देते हैं कि हम जो भी कार्य कर रहे हैं वे सभी श्री राम के दिए हुए हैं और हमें उन्हें निष्ठा और लगन से करना है।
हनुमान जी जैसे और आगे बढ़े तो उन्होंने पाया कि कोई उन्हें नीचे खींच रहा है। हनुमान जी ने यह देखा कि एक राक्षस है जो उन्हें आगे बढ़ने से रोक रहा है। हनुमान जी ने उसका वध किया। यह हनुमान जी का संदेश है कि अच्छे कार्य करने में जो विघ्न आते हैं उन्हें तुरंत नष्ट कर देना है। कारण कि यदि ये विघ्न रहे तो अन्य अनगिनत प्राणियों के सद्कार्यों में रुकावट डालते रहेंगे।
3. लंका प्रवेश और अशोक वाटिका में माता सीता से भेंट
हनुमान जी लंका के द्वार पर आ गए और वहां एक लंकिनी नाम की पहरेदार है। वह उन्हें रोकती है और हनुमान जी उसको मारते नहीं, उस पर एक हल्का प्रहार करते हैं और वह लंकिनी उन्हें प्रणाम करती है और अंदर जाने देती है। हनुमान जी यह बताते हैं कि किन्हीं किन्हीं दुष्टों को अच्छे रास्ते पर लाया जा सकता है।
वे एक अत्यंत सूक्ष्म रूप धारण कर लंका में प्रवेश करते हैं। उनकी यात्रा रात्रि में शुरू होती है। हनुमान जी यह संदेश देते हैं कि दिन में तो सभी जेंटिलमैन रहते हैं लेकिन उनका असली चरित्र रात के समय ही जाना जा सकता है। हनुमान जी देखते हैं कि लंका में तो सभी घर मंदिर के रूप में हैं—
"मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा, देखे जहं तहं अगनित जोधा।"
घर तो मंदिर जैसे हैं, लेकिन मन्दिर की आड़ में कुछ और चल रहा है। यहां तक कि इन मंदिरों रूपी घरों में उन्हें एक अलग घर दिखाई देता है। इस घर में तुलसी का पौधा लगा है और राम नाम का स्मरण हो रहा है। हनुमान जी का यह संदेश है कि अच्छे लोगों से परिचय अवश्य लेना चाहिए। कारण कि यहां हानि की संभावना कम रहती है।
वानर सेना में श्री हनुमान जी ही एक ऐसे वानर हैं जो सूक्ष्म से सूक्ष्म और विशाल से विशाल रूप धारण करने में सक्षम हैं। वे अब अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं। वहां वे सीता माता को देखते हैं। वे सोचते हैं कि उनके पास वे कैसे जाएं। वे अपने सूक्ष्म रूप में वहां उस अशोक वृक्ष के ऊपर पहुंचते हैं जहां सीता माता बैठी हैं। इतने में रावण वहां अपनी रानियों एवं पटरानी मंदोदरी के साथ आता है और उन्हें धमकाने का वीभत्स कार्य करता है और अंततः राक्षसियों को राक्षसी आदेश देकर लौट जाता है।
हनुमान जी विचार ही कर रहे थे कि वहां वे एक स्वप्न का विवरण एक राक्षसी, जिसका नाम त्रिजटा है, से सुनते हैं जिसमें वह राक्षसियों से कहती है कि एक वानर ने लंका में प्रवेश किया है और उसने लंका को जलाकर राख कर दिया है और रावण का नाश हो गया है। उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि जो कार्य उन्होंने किया ही नहीं उसे इस राक्षसी ने स्वप्न में देखा है। वे उसके व्यवहार से पता लगा लेते हैं कि यह राक्षसी प्रभु श्री राम की भक्त है और हो सकता है कि इसने स्वप्न में सत्य का दर्शन किया हो।
श्री राम कथा के सर्वश्रेष्ठ गायक श्री हनुमान जी हैं। उन्होंने अपने गुरु सूर्य देव से गायन की शिक्षा प्राप्त की है। राम कथा की विशेषता है कि इसके सुनने से दुखों का निवारण होता है और यही हुआ भी—
"सुनतहि सीता का दुःख भागा..."
सीता मैया के आदेश पर वे वृक्ष से नीचे उतरते हैं और उन्हें अपने विराट रूप को दिखाकर यह विश्वास दिला देते हैं कि प्रभु श्री राम उन्हें निरंतर स्मरण में रखते हैं। हनुमान जी उनसे अमोघ वरदान प्राप्त करते हैं—
"अजर अमर गुननिधि सुत होऊ। करहु सदा रघुनायक छोहू।।"
4. अयोध्या वापसी और हनुमान जी की अनूठी मांग
वे रावण की शक्ति को जानना चाहते हैं और रावण की अशोक वाटिका को तहस नहस कर देते हैं और रावण के पुत्र मेघनाद द्वारा छोड़े गए ब्रह्मास्त्र में ब्रह्मा जी का सम्मान करते हुए बंध कर रावण के दरबार में पहुंचते हैं। दुर्बुद्धि को सद्बुद्धि की ओर मोड़ना ही श्री हनुमान जी का कार्य है और यह सद्बुद्धि तभी तक सद्बुद्धि बनी रहेगी जब तक यह प्रभु श्री राम का स्मरण करती है। राम बुद्धि से हटे कि बुद्धि में रावण ने प्रवेश किया और फिर—
"बुद्धि नाशो प्रणश्यति।"
श्री हनुमानजी निराभिमानी हैं। श्री राम के निकट पहुंचने के लिए निराभिमानी होना एक अनिवार्य आवश्यकता है। वे जब सीता मैया का संदेश लेकर श्री राम के पास पहुंचते हैं तो श्री राम उनसे पूछते हैं कि हे हनुमान, तुमने रावण द्वारा पालित और सुरक्षित लंका को कैसे जला डाला तो हनुमान जी उत्तर देते हैं कि हे प्रभु, मैं तो बंदर हूं। बंदर में इतनी ताकत कहां कि वह कुछ कर सके। उसमें तो इतनी ही शक्ति होती है कि वह एक डाली से कूद कर दूसरी डाली पर चला जाता है। यह जो भी लंका में हुआ है वह सब आपने किया है और यह आपकी महानता है कि काम आप करते हैं और उसका यश आप अपने दास को दे देते हैं।
लंका विजय के पश्चात भगवान श्री राम, मां जानकी और लक्ष्मण अयोध्या पहुंचते हैं। श्री राम का राज्याभिषेक होता है और भगवान श्री राम सभी साथियों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि जितने भी मेरे निकट के लोग अर्थात मां, बंधु, परिवार के अन्य लोग आदि मुझे इतने प्रिय नहीं हैं जितने कि तुम वानर लोग हो।
श्री राम सभी को विदा करते हैं। सुग्रीव, विभीषण, जामवंत, निषाद राज, केवट, अंगद, नल, नील आदि। हनुमान जी सुग्रीव की इजाजत लेकर राम दरबार में रुक जाते हैं। श्री राम हनुमान जी को सबसे बहुमूल्य भेंट देते हैं लेकिन हनुमान जी निर्विकार बैठे हैं। श्री राम हनुमान जी को अपने वस्त्र और आभूषण देते हैं। हनुमान जी नहीं लेते। सीता माता उन्हें अपना चंद्र हार देती हैं। हनुमान जी नहीं लेते। भरत और शत्रुघ्न उन्हें बहुमूल्यवान वस्त्र और आभूषण देती हैं। हनुमान जी नहीं लेते। सभी माताएं उन्हें अमूल्य उपहार देती हैं। हनुमान जी नहीं लेते।
श्री राम चिंतित हो उठते हैं कि हनुमान को क्या हो गया है। श्री राम ने सोचा कि संभवतः हनुमान शर्मा रहा है। सबके सामने लेने में उसे संकोच हो रहा है। मैं हनुमान से अकेले में मिलूंगा और उसे भेंट दूंगा। वह सुबह उठते हैं। देखते हैं कि हनुमान जी तो उनसे पहले उठकर सरयू स्नान कर चुके हैं। भगवान श्री राम हनुमान जी के पास पहुंचे। श्री राम ने पूछा, हनुमान क्या बात है। कल सबने भेंट स्वीकार की और तुमने नहीं की। बोलो क्या चाहते हो। जो चाहे वह ले लो।
प्रभु श्री राम का आश्वासन पाकर श्री हनुमान जी बोले, हे प्रभु जो मैं मांगूंगा, वह मिलेगा?
हां, अवश्य मिलेगा। तुम मांगो तो।
श्री हनुमान जी ने कहा कि हे प्रभु, इस धरती पर जहां कहीं भी प्राणी आपका नाम, अर्थात राम नाम ले, आप मुझे वहां पहुंचा दीजिए।
श्री राम बोले, एवमस्तु। ऐसा ही होगा।
श्री राम के चरणों पर हनुमान जी दंडवत थे। तब से लेकर आज तक जहां श्री राम के नाम की ध्वनि आती है हनुमान जी वहां सुनने के लिए पहुंच जाते हैं।
श्री राम जय राम जय जय राम,
श्री राम जय राम जय जय राम।।
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